बहुत समय पहले बंगाल देश में एक महान और समृद्ध राजा राज्य करते थे, जिनका नाम राजा गोपीचंद था। उनका राज्य बहुत विशाल और संपन्न था। राज्य में सुख-समृद्धि थी, प्रजा प्रसन्न थी और महलों में ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं थी। राजा गोपीचंद की माता का नाम रानी मैनावती था। वे बहुत ही धर्मपरायण, बुद्धिमती और दूरदर्शी स्त्री थीं। कहा जाता है कि उन्होंने महान योगियों की सेवा की थी और उनसे जीवन का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया था। गोपीचंद के मामा थे महान राजा राजा भर्तृहारी, जिन्होंने स्वयं भी संसार का त्याग कर वैराग्य का मार्ग अपनाया था। राजा गोपीचंद युवावस्था में अत्यंत सुंदर, बलवान और ऐश्वर्यशाली थे। उनके पास असीम धन-संपत्ति थी। महलों में सोने-चाँदी के बर्तन, सुगंधित उद्यान, संगीत, नृत्य और विलासिता की हर वस्तु मौजूद थी। उनकी कई सुंदर रानियाँ थीं और वे उनके साथ सुख-विलास में जीवन बिताते थे। हर दिन महल में उत्सव जैसा वातावरण रहता था। लेकिन इस सब वैभव को देखकर भी उनकी माँ मैनावती के मन में एक गहरी चिंता रहती थी। एक दिन रानी मैनावती महल की ऊँची अटारी पर खड़ी थीं। नीचे उन्होंने देखा कि राजा गोपीचंद अपनी रानियों के साथ हँसी-मज़ाक और आनंद में मग्न हैं।
कथा प्रसंग 1
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