उन्नीसवीं शताब्दी में, जब भारत कई छोटी-छोटी रियासतों में विभाजित था, मध्य भारत के पन्ना क्षेत्र में एक भक्त हुए जिनका नाम था हिम्मत दास । वे जन्म से एक ब्राह्मण थे, जो भौतिक रूप से अत्यंत निर्धन थे, किन्तु उनकी आध्यात्मिक सम्पदा अपार थी। उनका जीवन सरल और भक्तिमय था, जिसका केंद्रबिंदु भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा और साधु-संतों की सेवा का कठोर व्रत था। उनके माता-पिता स्वयं भगवत भक्त और साधु-सेवी थे, जिसके कारण हिम्मत दास को बाल्यकाल से ही हरि-भक्ति और संत-सेवा के संस्कार मिले थे । उनका नित्य का नियम था कि वे अपने गाँव से कई मील दूर पन्ना स्थित युगल किशोर जी के मंदिर में झाँझ बजाते हुए और कीर्तन करते हुए दर्शन के लिए जाते थे । यह यात्रा उनकी दृढ़ निष्ठा और अविचल प्रेम का प्रमाण थी। इस भक्ति-पथ पर वे अकेले नहीं थे। उनकी धर्मपत्नी, जिनका नाम सुशीला बताया जाता है, केवल उनकी जीवन-संगिनी ही नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा में एक सच्ची सहधर्मिणी थीं। वे भी उतनी ही गहरी आस्था रखती थीं और अपने पति के साधु-सेवा के व्रत में पूरी तरह समर्पित थीं । उनकी कुटिया में भले ही अन्न का अभाव हो, पर भक्ति और संतोष का धन सदैव भरपूर रहता था। दोनों पति-पत्नी का जीवन इस सिद्धांत पर आधारित था कि घर पर आए अतिथि, विशेषकर साधु-संत, भगवान का ही रूप होते हैं और उनकी सेवा करना साक्षात प्रभु की सेवा करने के समान है। एक दिन, जैसा कि अक्सर होता है, भगवान अपने भक्तों की निष्ठा की परीक्षा लेते हैं। हिम्मत दास के द्वार पर साधुओं का एक समूह आ पहुँचा। भारतीय संस्कृति में "अतिथि देवो भव" का सिद्धांत सर्वोपरि है, और साधुओं को बिना सेवा-सत्कार के लौटा देना महापाप माना जाता है। हिम्मत दास और उनकी पत्नी के लिए यह एक धर्म-संकट था। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं था जिससे वे उन भूखे संतों को भोजन करा पाते । उनकी आँखों में चिंता की लकीरें उभर आईं, यह सोचकर कि वे अपने जीवन के सबसे बड़े व्रत, साधु-सेवा के धर्म, का पालन कैसे करेंगे।
कथा प्रसंग 1
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