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पौराणिक कथाएँ 23
पौराणिक कथाएँ 23
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 23 • कथा Pc3NNBinliDcB7LvgA
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श्री त्रिपुरदास जी का जन्म ब्रजमंडल के शेरगढ़ में हुआ था। उनके पिता राजमंत्री थे। बचपन से ही त्रिपुरदास जी में भक्ति के संस्कार थे। एक बार वे अपने पिता के साथ आगरा से किसी कार्य के लिए गिरिराज गोवर्धन जी आए। यहां उन्होंने ठाकुर श्रीनाथजी के दर्शन किए और उनके सुंदर रूप को देखकर बहुत आकर्षित हो गए। उन्होंने यह ठान लिया कि वे अब वापस नहीं जाएंगे, बल्कि रोज़ इन्हीं के दर्शन करेंगे और इनहीं के पास रहेंगे। उनके पिता ने वहां अपने किसी परिचित से कहा कि यह बालक हठ कर रहा है, तो वे उसे कुछ दिनों के लिए अपने पास ही रख लें। वे अपने पुत्र को वहीं छोड़कर वापस लौटने के लिए निकल पड़े। रास्ते में कुछ शत्रु दल के सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और उन्हें मार डाला। भक्तों के जीवन में विपत्तियाँ प्रायः प्रारंभ से ही आती हैं। जब त्रिपुरदास जी ने सुना कि उनके पिता को शत्रु दल ने मार डाला है, तो उन्होंने श्रीनाथजी की ओर देखा और कहा, "अब आप ही मेरे पिता, मित्र और मेरा सब कुछ हो। " उनके हृदय में गहरा आनंद हुआ कि उनका नाममात्र का पिता अंतर्ध्यान हो गया, लेकिन उनका अपने वास्तविक पिता (जो अनंत जन्मों से उनका साथ देने वाला है) से संबंध बन गया। अब उनका केवल श्रीनाथजी पर ही विश्वास था, और वे निश्चिंत हो गए। वे रोज़ प्रभु के सामने भाव-विभोर होकर रोते रहते थे। एक दिन जब वल्लभाचार्य महाप्रभु, जिन्होंने श्रीनाथजी को प्रकट किया था, ठाकुर जी की सेवा में आए, तो उन्होंने देखा कि यह बालक ठाकुर जी को देखकर रोता रहता है। वल्लभाचार्य जी ने अपने अनुयायियों से पूछा और उन्हें बताया गया कि वह एक राजमंत्री का पुत्र है, जिसके पिता यात्रा के दौरान मारे गए और वह श्रीनाथजी में बहुत आसक्त है। त्रिपुरदास जी ने श्री वल्लभाचार्य जी को साष्टांग दंडवत किया और कहा, "प्रभु, मैं एक अनाथ बालक हूँ और मेरे नाथ केवल श्रीनाथजी ही हैं। मुझे स्वीकार कर लीजिए। " वल्लभाचार्य जी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने त्रिपुरदास जी को दीक्षा दे दी। वे कुछ दिन तक त्रिपुरदास जी को अपने पास रखते हुए उन्हें सेवा, ध्यान, और भक्तिमय जीवन जीने की शिक्षा देते रहे। फिर उन्होंने उन्हें वापस जाने का आदेश दिया, साथ ही आशीर्वाद दिया कि वे श्रीनाथजी की सेवा और चिंतन करते हुए जीवन व्यतीत करें। गुरु आज्ञा का पालन करते हुए वे वापस अपने पिता की नगरी में चले गए। श्री त्रिपुरदास जी जब कुछ बड़े हुए, तो राजा ने उनके पिता का पद उन्हें सौंप दिया, और वे राजमंत्री बन गए।

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