वनवास के समय भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी में निवास कर रहे थे। उसी समय उन्हें यह दुखद समाचार मिला कि अयोध्या में महाराज दशरथ का देहांत हो गया है। यह समाचार सुनकर श्रीराम अत्यंत दुःखी हो गए। धर्म के अनुसार पिता की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान करना आवश्यक होता है। इसलिए श्रीराम ने निश्चय किया कि वे अपने पिता का श्राद्ध पवित्र तीर्थ गया में जाकर करेंगे, क्योंकि वहाँ पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है। कुछ समय बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण गया पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने विधि-विधान से श्राद्ध कर्म की तैयारी शुरू की। पूजा के लिए कुछ आवश्यक सामग्री अभी बाकी थी, इसलिए श्रीराम लक्ष्मण के साथ वह सामग्री लाने के लिए नगर की ओर चले गए और माता सीता वहीं रुक गईं। दशरथ की आत्मा का प्रकट होना इधर समय बीतता जा रहा था। तभी अचानक वहाँ महाराज दशरथ की आत्मा प्रकट हुई। उन्होंने माता सीता से कहा — “पुत्री, मुझे बहुत भूख लगी है। श्राद्ध का समय निकल रहा है। तुम मुझे पिंडदान दे दो ताकि मेरी आत्मा को शांति मिले। ” यह सुनकर माता सीता बहुत असमंजस में पड़ गईं।
कथा प्रसंग 1
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