Skip to main content
Part 1 of 4
Aa
पौराणिक कथाएँ 23
पौराणिक कथाएँ 23
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 23 • कथा jDO8o2s8Jofvv0s3NsKq
1 / 4

कभी-कभी हम जिस सत्य को अपनी बुद्धि से तौलते हैं, वही सत्य जब भक्ति के सामने आता है तो हमें झुका देता है। भक्ति प्रश्न नहीं करती… भक्ति समर्पण करती है। ऐसी ही एक अद्भुत और हृदय को कंपा देने वाली कथा है महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी की। एक बार किसी ने तुलसीदास जी से कहा कि नीलाचल, श्रीजगन्नाथ पुरी में स्वयं भगवान साक्षात् दर्शन देते हैं। यह सुनते ही तुलसीदास जी का हृदय आनंद से भर गया। मन में विचार आया — यदि प्रभु स्वयं दर्शन देते हैं, तो उनके चरणों में शीश रखने का सौभाग्य मुझे भी मिलना चाहिए। अपने इष्ट श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा लेकर वे श्रीजगन्नाथ पुरी की ओर चल पड़े। महीनों की कठिन यात्रा… थकान… भूख… प्यास… पर हृदय में केवल एक ही भाव — प्रभु दर्शन। जब वे पुरी पहुँचे और मंदिर में अपार भीड़ के बीच गर्भगृह में प्रवेश किया,तो जैसे ही उनकी दृष्टि श्रीजगन्नाथ जी पर पड़ी —

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
1 / 4