कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 10 • कथा Q9ECu2fwwYJlFCA6uvZD
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उस दिन आकाश मानो फट पड़ा था। घनघोर वर्षा निरंतर बरस रही थी। दिन-रात का भेद मिट चुका था, केवल सूर्य की गति से ही समय का अनुमान लगाया जा सकता था। प्रेमनिधि जी का मन अशांत था। उनके हृदय में बस एक ही चिंता थी— “कहीं इस मूसलाधार वर्षा में मेरे ठाकुर जी की सेवा में कोई बाधा न आ जाए। ” इसी व्याकुलता में वह पूरी रात सो न सके। जब उन्हें लगा कि सेवा का समय हो गया होगा, तो बिना देर किए कंधे पर घड़ा उठाया और अंधेरी, काली रात में यमुना जी की ओर चल पड़े। मन में केवल ठाकुर जी का स्मरण था—पग डगमगा रहे थे, चारों ओर जल ही जल था, रास्ता पहचान में नहीं आ रहा था। अचानक, उस घनघोर अंधकार में उन्हें हल्का-सा प्रकाश दिखाई दिया।
