एक गांव में एक ठाकुर थे। उनके यहां एक नौकर काम करता था.. जिसके कुटुंब में बीमारी की वजह से कोई आदमी नहीं बचा। केवल नौकर का लड़का रह गया। वह ठाकुर के घर काम करने लग गया.. रोजाना सुबह वह बछड़े चराने जाता था.. और लौटकर आता तो रोटी खा लेता था। ऐसे समय बीतता गया। एक दिन दोपहर के समय वह बछड़े चरा कर आया तो ठकुरानी की नौकरानी ने उसे ठंडी रोटी खाने के लिए दे दी। उसने कहा कि थोड़ी सी छाछ (लस्सी) मिल जाए तो ठीक है। नौकरानी ने कहा कि, जा जा तेरे लिए बनाई है लस्सी, जा ऐसे ही खा ले नहीं तो तेरी मर्जी। उस लड़के के मन में गुस्सा आया कि, मैं धूप में बछड़े चरा कर आया हूं, भूखा हुँ.. और मेरे को बाजरे की सूखी रोटी दे दी.. लस्सी मांगी तो तिरस्कार कर दिया.. वह भूखा ही वहां से चला गया। गांव के पास में एक शहर था.. उस शहर में संतों कि एक मंडली आई हुई थी.. वह लड़का वहां चला गया। संतों ने उसको भोजन कराया और पूछा कि तेरे परिवार में कौन हैं।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 10 • कथा Tj7kXFACYrSKHlXyAKoA
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