उड़ीसा के एक गाँव में बंधु मोहंती नाम के व्यक्ति रहते थे। वे बहुत ही गरीब थे और केवल भिक्षा माँग कर अपना व परिवार का पोषण करते थे। ये नित्य सत्संग के लिए जाया करते थे और इस से इनके मन में संकल्प बना कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है भगवद् प्राप्ति करना। इसलिए ये भिक्षा को भी ज़्यादा महत्व नहीं देते थे। बस पेट भरने के लिए दो-चार घरों से भिक्षा का प्रयास करते, यदि ना मिले तो उपवास कर लेते और एकांत में खूब नाम कीर्तन करते। उन्होंने अपनी पत्नी को भी जीवन का परम लाभ समझाते हुए अपने साथ नाम कीर्तन करने को कहा। अब दोनों पात पत्नी साथ में भजन करने लगे। बंधु के हृदय में विकलता आने लगी कि अब मुझे भगवान ज़रूर मिलेंगे। अब उन्हें किसी परिवार, मित्र, संबंधी आदि से मिलना अच्छा नहीं लग रहा था। उनकी हालत बहुत ही दयनीय थी। उनके पास बिलकुल भी धन नहीं था और भिक्षा से भी अन्न कभी-कभी ही मिलता था। उनके पास पहनने को फटे, पुराने और गाँठ बंधे हुए कपड़े ही थे। जब कई दिनों तक भोजन नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि यदि तुम साथ दो तो हम मेरे एक मित्र के पास जा सकते हैं। मेरा मित्र बहुत धनी और कृपालु है। मुझसे बहुत प्यार करता है। पाँच दिन का पैदल सफर है लेकिन उस के बाद हमें कभी भूखा नहीं रहना पड़ेगा। उनकी पत्नी पतिव्रता थीं और बंधु मोहंती की बात समझते हुए साथ चलने को मान गईं। कई दिन से भूखे होने के कारण पाँच दिन के लिए चलना असंभव सा था। बंधु मोहंती अपने दो बच्चों और पत्नी के साथ उस गाँव से निकल पड़े। रास्ते में जब भी बच्चे या पत्नी भूख के कारण चल नहीं पाते तो बंधु कोमल-कोमल पत्ते चुनकर लाते और उन को खिलाते। उन्हें कई बार केवल पानी पी कर ही संतोष करना पड़ता और वह सब आगे बढ़ते रहे। अंदर से प्रभु मिलन की चाह इतनी तीव्र थी कि बंधु मोहंती को भूख की परवाह नहीं थी। लेकिन अपने बच्चों और पत्नी को भूख से तड़पते देख वो अंदर ही अंदर भगवान से रोते हुए प्रार्थना करने लगते कि.. "हे प्रभु! मैं तो भूख सह सकता हूँ पर मेरे बच्चे कैसे इतना कष्ट झेल पाएँगे। ऐसा न हो कि हम आप तक पहुँच ही ना पाएँ। इसलिए मुझे इतना सामर्थ्य देना कि मैं शीघ्र आप तक पहुँच जाऊँ। " बंधु मोहंती का परिवार लड़खड़ाते हुए किसी तरह पाँच दिन में जगन्नाथ पुरी पहुँचा। श्री जगन्नाथ मंदिर मंदिर के दूर से दर्शन करते ही बंधु मोहंती साष्टांग लेटकर भूमि पर लोटने लगे और अपनी पत्नी से कहने लगे..
कथा प्रसंग 1
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