यह घटना है प्रयागराज की, प्रयागराज मे एक पंडित जी अपने पित्रों को तर्पण दे रहे थे. पंडित जी सुशिक्षित थे फिर भी वो ये सब कर रहे थे. पंडित जी को नदी मे तर्पण करता देख वहाँ मौजूद एक नई पीढ़ी का नौजवान आया और नदी मे आधे पाँव जल मे घुस कर हाथों से जल उठाया तथा सूर्य की ओर जल गिराते हुए उच्च स्वर मे आँखे बंद करके बोलता है! “यहां से कोसो दूर मेरी बकरी को प्यास लगी होगी ये जल उस तक जरूर पहुंचे.” नौजवान की इस मूर्खता भरी हरकत को देख पंडित जी हंस पड़े और ऐतराज़ जताते हुए नौजवान से बोले अरे यजमान यह आप क्या बोल रहे हो यहां से पानी आपकी जीवित बकरी तक कभी नहीं पहुंचेगा. इस पर नौजवान बोला! यदि आपका दिया हुआ जल पित्तरों तक पहुँच सकता तो मेरा यहां से अर्पण किया जल जल बकरी तक क्यों नहीं पहुँच सकता? पंडित जी को नौजवान के अल्प ज्ञान पर बड़ा दुख हुआ हालांकि तर्पण करने के पीछे की परम्परा, आस्था का रहस्य और वेदों के ज्ञान से पंडित जी भली भांति परिचित थे और पंडित जी इस बात से भी पूर्णतः अवगत थे की जल पित्रों तक पहुंचेगा या नहीं पर इसको नौजवान के सामने तत्काल सिद्ध कर पाना पंडित जी के लिए शायद असम्भव था क्योंकि उनके पास सिद्ध करने के लिए कोई मंत्र शक्ति या वस्तु उपलब्ध नहीं थी जिस वजह से उन्होंने उस नौजवान को उत्तर देना भी सही नहीं समझा और मौन हो गए.
कथा प्रसंग 1
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