Skip to main content
Part 1 of 4
Aa
पौराणिक कथाएँ 19
पौराणिक कथाएँ 19
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 19 • कथा 7ljcePcB4ellBrmeL1Rv
1 / 4

महान संत मलूक दास जी के मन में एक बार एक 'हठ' पैदा हुई। उन्होंने सोचा— "अगर ईश्वर कण-कण में है, तो क्या वो मुझे इस निर्जन जंगल में भी ढूंढ लेगा? क्या वो मुझे बिना मांगे खिलाएगा? " वे एक वीरान जंगल में गए और एक ऊँचे बरगद के पेड़ पर जाकर छिप गए। शर्त ये थी— "न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुँह खोलूंगा। देखूं तू खिलाता कैसे है! " शाम हुई... भूख से शरीर टूटने लगा, पर मलूक दास जी अडिग थे। तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने कुदरत के पहिये घुमा दिए! राजा का काफिला आया, छप्पन भोग सजे, पर नियति देखिए... डाकुओं के डर से वे सब खाना छोड़कर भाग निकले। अब नीचे भगवान का प्रसाद सजा था, पर मलूक दास जी की जिद अब भी बरकरार थी। तभी वहां 'मौत' का दूसरा नाम यानी खूंखार लुटेरे आ धमके मलूक दास जी बरगद की ऊँची डाल पर दुबके बैठे थे, और नीचे छप्पन भोग की महक हवाओं में तैर रही थी। तभी झाड़ियों के पीछे से खूंखार डाकुओं का एक गिरोह निकला।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
1 / 4