जब ठाकुर जी ने गूँगे बालक के वेश में आकर ब्राह्मण को परिश्रमिक दिया काशी में एक युवा ब्राह्मण थे , वे दिन भर सिर्फ भागवत जी का ही पाठ करते रहते और पाठ भी करते निष्काम भाव से, कोई अगर बुला ले जाता तो उसके लिए पाठ करते और दक्षिणा स्वीकार करते और फिर घाट पर आकर फिर पाठ करते। उनके घरवाले बड़े चिंतित हुए , पुराने ज़माने में किसी पर अगर ज़िम्मेदारी डालनी होती थी तो उसका विवाह करा दिया करते थे, सो घरवालों ने उनका ब्याह करा दिया , संतान भी हो गयी लेकिन उनका भागवत प्रेम नहीं छूटा बल्कि और बढ़ता ही रहा , वे घाट पर चले जाते और पाठ करते रहते , घर चलाना मुश्किल हो गया , एक दिन उनकी पत्नी बोलीं यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं कुछ कार्य कर के धन कमा लूँ ताकि घर चल सके , उन ब्राह्मण ने कहा जैसा तुमको उचित लगे, तो उनकी पत्नी ने दो चार घरों में भोजन प्रसाद बनाने का कार्य कर लिया जिससे घर चल जाता। एक दिन आठ दस संत आये और काशी में किसी ऐसे वैष्णव का घर ढूंढने लगे जिनके यहाँ वे भोजन कर सकें , किसी से पुछा तो उसने उन्हीं ब्राह्मण का घर बता दिया , सभी संत उन ब्राह्मण के घर पहुँच गए , ब्राह्मण की पत्नी से बोले बिटिया हम लोगों को बहुत ज़ोर से भूख लगी है , अगर हो सके तो ठाकुर जी का भोग लगा कर भोजन करा दो , उस ब्राह्मण पत्नी का तो हर्ष का ठिकाना न रहा कि उसके घर संत जन स्वयं पधारे हैं और भोजन मांग रहे हैं , उसने सभी संतों को बिठाया
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 19 • कथा bIoP9k6AkqHEXtX4QWd4
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