श्लोक संख्या 1
Ramayana Part 6 : Yuddhakand • अध्याय FccCpYSXUMIYGgzFfIb8
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रणभूमि में दशानन रावण को निष्प्राण और पराजित पड़ा देखकर उसके अनुज विभीषण का हृदय असह्य शोक से भर गया। वे अपने बड़े भाई के समीप आकर अत्यंत व्याकुल होकर करुण विलाप करने लगे। विभीषण ने कहा कि हे पराक्रमी भ्राता, आप सदा अमूल्य शय्याओं पर शयन करते थे, किंतु आज इस धूल-धूसरित भूमि पर असहाय होकर क्यों सो रहे हैं? आपके मस्तक का वह सूर्य समान देदीप्यमान मुकुट आज भूमि पर गिरा पड़ा है। आपकी विशाल और आभूषणों से सज्जित भुजाएँ अब सर्वथा निश्चेष्ट हो चुकी हैं।
