सत्ता जब अहंकार में डूब जाती है, तब उसे यह भान नहीं रहता कि संत को बंदी बनाया जा सकता है… पर उसकी भक्ति को नहीं। यह घटना उस युग की है, जब दिल्ली की गद्दी पर अकबर का शासन था और भारत की आत्मा में राम नाम की धारा बह रही थी। उस धारा के सबसे प्रखर प्रवाह थे — गोस्वामी तुलसीदास जी। तुलसीदास जी कोई दरबारी कवि नहीं थे, वे किसी राजा की प्रशंसा के लिए नहीं लिखते थे। वे तो राम के दास थे — और राम ही उनके राजा थे। एक बार अकबर के कानों तक यह बात पहुँची कि तुलसीदास जी ने मृत व्यक्ति को जीवित कर दिया है। दरबारियों ने इसे चमत्कार कहा, पर अकबर के मन में जिज्ञासा नहीं, अहंकार जाग उठा। उसने संदेश भिजवाया —तुलसीदास को हमारे दरबार में उपस्थित किया जाए। तुलसीदास जी ने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने कहा —मैं किसी राजा के दरबार में नहीं जाता, मैं तो केवल राम के चरणों में बैठता हूँ।
कथा प्रसंग 1
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