कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 21 • कथा d8rhgwhsZo5tsAtaG7qZ
1 / 4
एक भक्त की अंतिम पुकार शाम का धुंधलका गहरा रहा था। चंद्रभागा की लहरों में थका हुआ सूरज डूब रहा था, मानो वह भी तुकाराम के दुखों का बोझ सह नहीं पा रहा हो। किनारे पर बैठे तुका के पास आज न शब्द थे, न शब्दरचना। पास में पड़ा एकतारा भी जैसे उनके मौन रोदन को देख सहम गया था। उनकी फटी हुई गोदड़ी और काँपते हाथों में तुलसी की माला गवाही दे रही थी कि इस संसार ने उन्हें कितना छला है। लोग हँसे, पत्थर मारे, उनकी अभंगों की गाथा को नदी में डुबो दिया... पर तुका नहीं टूटे। लेकिन आज? आज उनका धैर्य जवाब दे रहा था। “विठ्ठल... क्या तू भी पत्थरों का हो गया? ” उनके कंठ से एक रुंधी हुई आवाज निकली। आँखों से बहता हुआ गरम आँसू जब सूखी जमीन पर गिरा, तो मानो धरती भी काँप उठी।
