कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 21 • कथा t9FJbvWzDJjsXMtVvt4L
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यह कथा श्री वृंदावन धाम के महान संत मोटे गणेशजी वाले महाराज (पूज्य श्री दुर्गाप्रसाद जी चतुर्वेदी) की है। यह हमें सिखाती है कि भगवान के नाम में वह सामर्थ्य है जो न केवल जपने वाले को, बल्कि उसकी पिछली कई पीढ़ियों को भी तार देता है। वृंदावन के सुप्रसिद्ध श्री राधावल्लभ लाल मंदिर के समीप 'मोटे गणेश मंदिर' स्थित है। यहाँ के महंत श्री दुर्गाप्रसाद जी चतुर्वेदी अपनी कठिन साधना और भगवद-भक्ति के लिए विख्यात थे। वे पहले रेलवे की प्रतिष्ठित नौकरी में थे, परंतु हृदय में वैराग्य जागृत हुआ तो सब कुछ त्यागकर पत्नी सहित ब्रज के चरणों में आ गए। एक बार उनके एक अनन्य शिष्य ने संकोचवश अपनी जिज्ञासा रखी, "महाराज जी, भगवद-प्राप्ति का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग क्या है? मैं भजन कैसे करूँ? " महाराज जी ने सरलता से उत्तर दिया, "पुत्र, केवल निरंतर नाम-जप करो।
