कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 28 • कथा p24BOI3VwOwkcRJ59q8h
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अष्टछाप के कवियों में सूरदासजी का स्थान सर्वोच्च है। उन्हें 'पुष्टिमार्ग का जहाज' कहा जाता है। सूरदासजी जन्मांध थे, लेकिन उनकी 'दिव्य दृष्टि' से उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का ऐसा वर्णन किया है जैसा कोई अपनी आँखों से देखकर भी नहीं कर सकता। श्रीमद् महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के शिष्य बनने के बाद, सूरदासजी ने अपना पूरा जीवन श्रीनाथजी की कीर्तन सेवा में समर्पित कर दिया। सूरदासजी और श्रीनाथजी: "भक्त की दिव्य दृष्टि" श्रीनाथजी के मंदिर में हर रोज प्रभु का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है। एक बार मंदिर के मुखिया और अन्य सेवकों के मन में एक कौतुक (शरारत) सूझा।
