महाभारत की कथा के अनुसार मृत्यु के उपरांत जब दानवीर कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इंकार कर दिया था। तब कर्ण ने चित्रगुप्त से पूछा कि मैंने अपनी सारी सम्पदा सदैव दान पुण्य में ही समर्पित की है तो फिर मुझ पर यह कैसा ऋण शेष रह गया है, तब चित्रगुप्त ने बताया, राजन आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुकता कर दिया परंतु आप पर पितृ ऋण शेष है। आपने अपने काल में सम्पदा एवं सोने का दान किया है। अन्न का दान नहीं किया। जब तक आप यह ऋण नहीं उतारते आपको मोक्ष मिलना संभव नहीं। इसके उपरांत धर्मराज ने दानवीर कर्ण को व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पृथ्वी पर जाकर अपने ज्ञात एवं अज्ञात पितरों को प्रसन्न करने के लिए विधिवत श्राद्ध-तर्पण तथा पिंड दान करके आइए तभी आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। दानवीर कर्ण ने वैसा ही किया तभी उन्हें मोक्ष मिला। किंवदंती है कि तभी से श्राद्ध की प्रथा आरंभ हुई। पितृपक्ष में संत, गुरुजन और रोगी वृद्ध या जरूरतमंदों की जितनी सेवा हो सके करना चाहिए। साथ ही अपने परलोक सुधार के लिए भी दान-पुण्य करना चाहिए।
कथा प्रसंग 1
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