बहुत समय पहले पंजाब क्षेत्र में स्यालकोट नाम का एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य था। उस राज्य के राजा का नाम राजा सालवान था। राजा सालवान बहुत ही पराक्रमी और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्रेम करती थी, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ी कमी थी—उनके कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा में राजा और उनकी पहली रानी ने अनेक यज्ञ, दान-पुण्य और तपस्या की। अंततः भगवान की कृपा से रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। उस बालक का नाम रखा गया पूरणमल। राजा सालवान ने राजकुमार के जन्म के बाद राज्य के विद्वान ज्योतिषियों को बुलाया, ताकि वे राजकुमार की कुंडली देख सकें। ज्योतिषियों ने ध्यानपूर्वक कुंडली का अध्ययन किया और एक गंभीर भविष्यवाणी की। उन्होंने कहा— यदि राजा सालवान ने बारह वर्षों तक अपने पुत्र का मुख देखा, तो राज्य पर भयंकर संकट आएगा और राज्य का विनाश हो सकता है। यह सुनकर राजा बहुत चिंतित हो गए। अपने राज्य और प्रजा की रक्षा के लिए उन्होंने एक कठोर निर्णय लिया। उन्होंने आदेश दिया कि राजकुमार पूरणमल को एक सुरक्षित तहखाने (भूमिगत कक्ष) में रखा जाए, जहाँ उनका पालन-पोषण तो अच्छे से हो, लेकिन राजा स्वयं उनका मुख न देखें। इस प्रकार पूरणमल का बचपन महल से दूर, उस तहखाने में बीता। वहाँ उनकी देखभाल के लिए सेवक और शिक्षक रखे गए थे। उन्हें शिक्षा, शास्त्र, नीति और धर्म का ज्ञान दिया गया।
कथा प्रसंग 1
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