पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने अग्रसर होती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं— माते, मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ। न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद। न मान मुझे बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में। काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है। कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं— कृष्ण…! ! ! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था। जब उसका दूध उतरता था और गोद सूनी रह जाती थी, तब उसकी आत्मा पर क्या बीतती थी—
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 37 • कथा 7jx7gswdJk78p4acGGem
1 / 4
