कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 37 • कथा Br74W3XBFjKQ5QiylIqu
1 / 4
यह प्रसंग पुष्टिमार्ग के इतिहास में सबसे भावुक और महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है। जब सूरदासजी का अंत समय निकट आया, तब श्री विट्ठलनाथजी (गुसाईं जी) ने जो शब्द कहे, वे आज भी हर वैष्णव के हृदय में अंकित हैं। पुष्टिमार्ग का जहाज: सूरदासजी का अंतिम समय सूरदासजी कई वर्षों तक श्रीनाथजी की सेवा करने के बाद, अंततः पारसोली (चंद्र सरोवर के पास) में जाकर लेट गए। उन्हें आभास हो गया था कि अब वे अपने प्रभु के नित्य लीला-धाम में प्रवेश करने वाले हैं। उधर, गोवर्धन में श्रीनाथजी के मंदिर में जब श्री विट्ठलनाथजी (महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र) आरती कर रहे थे, तो उन्हें अपनी दिव्य शक्ति से ज्ञात हुआ कि सूरदासजी अब विदा ले रहे हैं।
