कहते हैं कि समय के अनादि चक्र में एक बार ऐसा प्रसंग आया जब यमलोक में विचित्र शांति छा गई। सामान्यतः वहाँ दूतों का आवागमन लगा रहता था—किसी को प्रेतलोक से लाना, किसी को कर्मों के अनुसार मार्ग दिखाना। परन्तु उस दिन न नरक का द्वार खुल रहा था, न यमदूत लौट रहे थे, न किसी पापी आत्मा की चीख वहाँ गूंज रही थी। पूरा यमलोक जैसे मौन हो गया था। यमराज अपने सिंहासन पर बैठे थे, परंतु उनके मन में गंभीर चिंता ने घर कर लिया। उन्होंने चित्रगुप्त को बुलाया। "चित्रगुप्त! आज बहीखाते इतने शांत क्यों हैं? कहीं कोई त्रुटि तो नहीं? " चित्रगुप्त ने नम्र स्वर में कहा— "प्रभु, बहीखाते बिल्कुल सही हैं। तीन दिनों से एक भी नई आत्मा को नरक का मार्ग नहीं मिला है। सबके पाप जैसे विलीन हो रहे हैं। " यमराज की भौंहें तन गईं। "क्या संसार में पाप समाप्त हो गया? क्या लोग अब पूर्णतः पवित्र हो गए? " चित्रगुप्त भी चकित थे, "प्रभु, पाप का पूर्णतः अंत तो संभव नहीं… परंतु ऐसा लग रहा है मानो किसी अदृश्य शक्ति ने संसार के पापों को धो दिया हो। " यमराज के मन में संशय और जिज्ञासा दोनों उत्पन्न हुए। उन्होंने निर्णय लिया— “इस रहस्य का समाधान केवल भगवान श्रीहरि विष्णु ही बता सकते हैं।
कथा प्रसंग 1
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