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पौराणिक कथाएँ 43
पौराणिक कथाएँ 43
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 43 • कथा PFMpx2x3UywKV6V8vFWU
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पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में कृष्णदास जी का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। वे न केवल एक महान कवि थे, बल्कि श्रीनाथजी के मंदिर के मुख्य 'अधिकारी' भी थे। उनके और श्रीनाथजी के बीच के संबंध में 'सख्य भाव' और 'वात्सल्य' का अद्भुत मिश्रण था। 'प्रभु का हठ' और कृष्णदास जी की यह कहानी पुष्टिमार्ग के 'वार्ता साहित्य' की सबसे प्रिय कथाओं में से एक है: कृष्णदास जी श्रीनाथजी के मंदिर की हर छोटी-बड़ी व्यवस्था का ध्यान रखते थे। चाहे वह छप्पन भोग की तैयारी हो, श्रृंगार की सामग्री जुटाना हो या मंदिर का हिसाब-किताब देखना—वे हर काम पूरी निष्ठा से करते थे। पुष्टिमार्ग में माना जाता है कि श्रीनाथजी साक्षात सात वर्ष के बालक के रूप में वहां निवास करते हैं। कृष्णदास जी उन्हें मूर्ति नहीं, बल्कि अपना सखा और एक चंचल बालक मानते थे। एक बार की बात है, श्रीनाथजी के राजभोग (दोपहर का मुख्य भोजन) का समय निकट था। मंदिर की रसोई में बहुत हलचल थी।

सनातन ज्ञान धारा • Timeless Spiritual Guidanceकृतान्त शास्त्र संग्रह
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