यह प्रसंग श्री नाभादास जी द्वारा रचित 'भक्तमाल' की परंपरा से जुड़ा है, जो महान संत और कथावाचक श्री श्रीभट्ट देवाचार्य जी के जीवन की एक अत्यंत सरस घटना है। एक बार परम विरक्त संत व्यास जी (श्रीभट्ट जी) एकांत में बैठकर श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा का मर्म लिख रहे थे। वे पूरी तरह भक्ति भाव में डूबे हुए थे और ठाकुर जी की लीलाओं का सूक्ष्म वर्णन कर रहे थे। ठाकुर जी को अपने भक्तों के साथ विनोद करना बहुत प्रिय है। वे जानते थे कि व्यास जी पूरी एकाग्रता से लिख रहे हैं, इसलिए उन्होंने एक नन्हा सा बालक (ग्वाल-बालक) का रूप धरा और उनकी कुटिया में पहुँच गए। व्यास जी जैसे ही कोई श्लोक लिखते, वह बालक पीछे से आकर कभी उनकी कलम (लेखनी) छीन लेता, तो कभी उनकी पोथी (किताब) के पन्ने पलटने लगता। पहली बार: व्यास जी ने प्यार से समझाकर बालक को दूर बिठा दिया। दूसरी बार: बालक ने उनकी स्याही की दवात ( में उँगली डाल दी और पूरे पन्ने पर नीले निशान बना दिए। तीसरी बार: जब व्यास जी एक अत्यंत गंभीर भाव लिख रहे थे, तो बालक ने आकर उनकी आँखों पर अपने नन्हे हाथ रख दिए (आँख-मिचौली)।
कथा प्रसंग 1
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