कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 32 • कथा aac0aprEJVb6Efa80c2F
1 / 4
पुराने समय की बात है। एक ऋषि के पास एक व्यक्ति तत्त्व-ज्ञान-साधना के लिए गया। दीक्षा प्राप्ति के उपरान्त शिष्य ने गुरु से गुरु-दक्षिणा का आग्रह किया। गुरुदेव शिष्य के मन की बात समझते थे – हुआ कुछ ऐसा था कि गुरु जी की कुछ बताई विधियाँ उसने पहले से पढ़ी हुई थीं और उन कुछ पलों में शिष्य के मन में यह भाव आ गया था कि गुरुदेव की कम से कम ५०% शिक्षा तो व्यर्थ ही है। गुरु दक्षिणा की बात पर गुरु ने युवक से कहा कि जीवन के इस पड़ाव में वह कोई भी कीमती या उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि कुछ अलग चाहते हैं। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा कि वह दक्षिणा में उन्हें ऐसी चीज दे, जो कि बिलकुल व्यर्थ हो।
