बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध नगर में दो व्यापारिक मित्र रहते थे। उनका मुख्य व्यवसाय दूर-दराज के गाँवों और शहरों में जाकर माल बेचना था। वे अपने कीमती सामानों को ऊंटों की पीठ पर लादकर लंबी यात्राएँ किया करते थे। उनका पूरा जीवन इन्हीं यात्राओं और व्यापार पर टिका था। एक बार, उन्होंने एक बहुत दूर के राज्य में जाकर व्यापार करने की योजना बनाई। पूरी तैयारी के साथ, ऊंटों पर रेशम, मसाले और अन्य वस्तुएँ लादकर वे अपनी यात्रा पर निकल पड़े। मार्ग में एक विशाल और निर्जन रेगिस्तान पड़ता था। जब वे रेगिस्तान के बीचों-बीच पहुँचे, तब दोपहर का समय था। सूरज आग उगल रहा था और नीचे की रेत भट्टी की तरह तप रही थी। भीषण गर्मी और रेत की थकावट ने व्यापारियों और ऊंटों, दोनों को बेहाल कर दिया था। तभी दूर उन्हें रेत के टीलों के बीच एक नखलिस्तान की तरह एक भव्य धर्मशाला दिखाई दी। थके हुए व्यापारियों ने राहत की साँस ली। उन्होंने सोचा कि यहाँ कुछ देर विश्राम करेंगे और रात बिताकर अगले दिन तरोताजा होकर निकलेंगे। जब वे धर्मशाला पहुँचे, तो वहाँ सन्नाटा था। वहाँ कोई और यात्री नहीं था। शाम ढलने लगी तो व्यापारियों के सामने एक समस्या आई। उन्होंने सोचा, "अगर हम अंदर जाकर सो गए और रात में ऊंट भाग गए, तो हमारा सारा माल और मेहनत बर्बाद हो जाएगी। " धर्मशाला के कमरे इतने छोटे थे कि ऊंटों को अंदर नहीं ले जाया जा सकता था और बाहर उन्हें खुला छोड़ना जोखिम भरा था।
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 32 • कथा jHUdDWgq9XRQjgVquHJk
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