प्राचीन भारत के एक विशाल नगर में हेमकुंडल नाम का एक प्रसिद्ध ब्राह्मण रहता था। जन्म से वह सुवर्ण समान तेजस्वी था—वेद वेदांगों का गहरा ज्ञाता, अनुष्ठानों का पारंगत, और दान-पुण्य की महिमा को जानने वाला। परंतु उसके स्वभाव में एक बड़ी दुर्बलता थी—लोभ और क्रोध। यज्ञानुष्ठान करता अवश्य था, परंतु उसके मन का केंद्र ईश्वर नहीं, बल्कि धन-संग्रह था। वह यजमानों से अधिक दक्षिणा लेने के लिए छल-कपट भी कर लेता था। उसके हृदय में करुणा का नाम मात्र भी न था। भीख माँगने आए गरीबों को वह डपटकर भगा देता था, और जरा-सी बात पर क्रोध कर उठता था। कहते हैं— “ज्ञान अनल है, पर करुणा शीतल जल है। दोनों साथ हों तभी जीवन सुंदर बनता है। ” हेमकुंडल का ज्ञान आग की तरह दहकता था, पर करुणा का जल उसमें न था। समय बीता, और एक दिन उसकी मृत्यु का समय आ पहुँचा। जब यमदूत उसे ले गए और उसके कर्मों का लेखा-जोखा खोला गया, तो पाया गया कि— उसने वेदज्ञान का उपयोग मात्र अपने स्वार्थ के लिए किया, अत्यधिक लोभ में रहा, और क्रोध के कारण अनेक लोगों को दुख पहुँचाया। इसलिए, उसके सत्कर्म बहुत हल्के पड़े और तामसी प्रवृत्तियाँ भारी। यमराज ने निर्णय दिया—
कथा प्रसंग 1
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