प्राचीन काल की बात है, एक समृद्ध नगर में सोमदत्त नाम का एक व्यक्ति रहता था। सोमदत्त के पास धन की कमी नहीं थी, पर उसकी इच्छाओं का आकाश अनंत था। वह हर दिन नई सफलताओं के पीछे भागता, व्यापार को और फैलाने की जुगत में रहता, लेकिन जितनी मेहनत करता, मानसिक शांति उतनी ही दूर भागती। वह जो भी पाना चाहता, अंततः वह उसके हाथ से फिसल जाता। एक दिन, विफलताओं से थके सोमदत्त की भेंट एक तेजस्वी संन्यासी से हुई। उनकी शांति देखकर सोमदत्त के भीतर कुछ टूट गया। उसे समझ आया कि जिसे वह 'जीवन' समझ रहा है, वह तो मात्र एक 'दौड़' है। धीरे-धीरे उसके भीतर वैराग्य की ज्वाला प्रज्वलित हुई। उसने सब कुछ त्याग दिया और हिमालय की कंदराओं में जाकर साधना करने लगा। तपस्या और देव-आगमन सालों की कठोर तपस्या, योग और यज्ञ के बाद सोमदत्त अब 'स्वामी सोमानंद' बन चुके थे। उनके चेहरे पर एक ऐसी दिव्य आभा थी जो केवल इच्छाओं के भस्म होने पर ही आती है। उनकी निष्काम भक्ति से स्वर्ग का सिंहासन डोल उठा। स्वयं एक देवता उनके सम्मुख प्रकट हुए।
कथा प्रसंग 1
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