माता वैष्णो देवी की अमर कथा में उनके "कुमारी" रहने का रहस्य उनके परम भक्त हनुमान, भैरव नाथ और भगवान श्री राम से जुड़ा है। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि अटूट भक्ति, धैर्य और धर्म की स्थापना की गाथा है। माता वैष्णो देवी के 'कन्या' या 'कुमारी' रूप में रहने की विस्तृत कथा : त्रेता युग में, दक्षिण भारत के रत्नाकर सागर के घर एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया। उनका नाम त्रिकुटा रखा गया। वे साक्षात शक्ति का अंश थीं। बचपन से ही त्रिकुटा का मन संसार के खेल-कूद में न लगकर भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था। जब वे विवाह योग्य हुईं, तो उन्होंने संकल्प लिया कि वे केवल भगवान विष्णु से ही विवाह करेंगी और किसी अन्य पुरुष को अपने जीवन में स्थान नहीं देंगी। अपने इसी संकल्प की सिद्धि के लिए वे कठोर तपस्या करने हेतु समुद्र तट पर चली गईं। भगवान श्री राम जब माता सीता की खोज में रामेश्वरम के तट पर पहुंचे, तब उनकी भेंट त्रिकुटा से हुई।
कथा प्रसंग 1
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