शीतला माता को बासी पकवान का भोग लगाया जाता है। हर साल चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी आती है। इस दिन माता शीतला की पूजा और कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। शीतला माता की कथा। एक गांव में एक ब्राह्मण दंपति रहता था। उनके दो बेटे और दो बहुएं थी। उन दोनों बहुओं को बहुत ही लंबे समय बाद बेटे हुए। इतने में शीतला अष्टमी का पर्व आया। शीतला अष्टमी के नियमानुसार, इस दिन ठंडा भोजन तैयार किया जाताहै। लेकिन, उन दोनों बहुओं के मन में विचार आया की यदि हमनें ठंड़ा भोजन खाया तो हम कहीं बीमार न पड़ जाएं। अभी बच्चे भी छोटे हैं कहीं वह भी बीमार न हो जाएं। ऐसा में उन दोनों ने चुपचाप अपने खाना खाने के लिए दो बाटियां पशुओं के दाना देने वाले बर्तन में बनाकर तैयार कर ली। इसके बाद दोनों बहुएं अपनी सास के साथ माता शीतला की पूजा करके घर आई और माता की कथा सुनी। पूजा से लौटकर आने के बाद सास तो शीतला माता के भजन गाने लगी लेकिन, दोनों बहुएं बच्चों के रोने का बहाना बनाकर वहां से घर लौट आइए।
कथा प्रसंग 1
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