कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 33 • कथा y2K48Jay3KIwCDeN8Rx3
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आज बात करते हैं एक ऐसी भक्त की, जिसने ईश्वर को 'भगवान' नहीं, बल्कि अपना 'बालक' मान लिया था। यह कहानी है करम़ेती बाई की, जिनकी ममता के आगे साक्षात जगन्नाथ जी को अपना मंदिर छोड़कर आना पड़ा। राजस्थान के परबतसर गाँव की रहने वाली करमेती बाई बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहती थीं। उनका विवाह हो गया, लेकिन उनका मन संसार में नहीं लगा। एक दिन वे घर-बार छोड़कर पैदल ही पुरी (ओडिशा) की ओर निकल पड़ीं, अपने 'साँवरिया' के दर्शन के लिए। रास्ते में तपता हुआ रेगिस्तान था। करमेती बाई के पास न धन था, न भोजन। उनके मन में बस एक ही भाव था— "मेरा बाल-कृष्ण (जगन्नाथ जी) मंदिर में भूखा होगा, उसे छप्पन भोग तो मिलते हैं, पर क्या किसी ने उसे माँ जैसी ममता से खिलाया है?
