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पौराणिक कथाएँ 30
पौराणिक कथाएँ 30
पौराणिक पावन कथा
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 30 • कथा RQEGRbpFC1A1JK41Oz58
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जगन्नाथ में खिचड़ी का भोग क्यों लगाया जाता है आईए जानते हैं इससे जुड़ी हुई कर्माबाई की कथा। जब-जब भगवान कृष्ण का उल्लेख आता है, करमा का नाम भी आ ही जाता है। करमा बाई को मारवाड़ की मीरा भी कहा जाता है। वे भगवान की महान भक्त थीं और भगवान श्री कृष्ण उनके हाथ से प्रतिदिन भोग ग्रहण कर, भोग की थाली रिक्त कर देते थे। राजस्थान के नागौर जिले की मकराना तहसील में एक गांव है– कालवा। इस गांव में जीवनराम डूडी के घर 1615 ईस्वी में एक पुत्री का जन्म हुआ। भगवान की बहुत मन्नतें मांगने के बाद इसका जन्म हुआ था, नाम रखा गया करमा। करमा के चेहरे पर एक अनोखी आभा रहती थी। जीवनराम स्वयं धार्मिक पुरुष एवं अनन्य कृष्ण भक्त थे। उन्होंने भगवान के नाम, ‘मदन मोहन‘ से अपने घर में कृष्ण भगवान का मंदिर बना रखा था। वे प्रतिदिन भगवान कृष्ण की पूजा करते, और भोग लगाते तथा भगवान को भोग लगाने के बाद ही भोजन ग्रहण करते। यह उनके घर का नित्य का नियम था। इसी प्रकार समय बीतता गया। करमा बाई प्रतिदिन अपने पिता को श्री कृष्ण भगवान की पूजा करते देखती, उन को भोग लगाते देखती। यही सब देखते सीखते करमा बाई का बचपन बीत रहा था। अतः बचपन से ही उस नन्ही करमा में भक्तिभाव के संस्कार थे। इन्ही संस्कारों के बीच पलते बढ़ते करमा 13 वर्ष की हो गई। एक बार जीवनराम को कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए, पुष्कर जाना था। उनकी पत्नी भी उनके साथ जा रही थी। वे करमा को भी साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन एक समस्या आ गई। उनकी अनुपस्थिति में भगवान को भोग कौन लगाता? इसलिए उन्होंने करमा को यह जिम्मेदारी सौंपी और बोले– पुत्री! हम दोनों पुष्कर स्नान के लिए जा रहे हैं। तुम सुबह भगवान को भोग लगाना और उसके बाद ही भोजन करना। करमा ने यह जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार कर ली। मां–पिता के तीर्थ यात्रा के लिए जाने पर, करमा ने सुबह स्नान आदि कर बाजरे का खिचड़ा बनाया और पूजा के लिए अपने घर मे बने भगवान के मंदिर के समीप आ गयी। भोग की थाल भगवान के सामने रख कर, हाथ जोड़कर बोली, हे प्रभु, भूख लगे तो भोग लगा हुआ है आप भोग ग्रहण कर लेना, तब तक मैं घर के और काम कर लेती हूं। इसके बाद वह काम में जुट गई। बीच–बीच में वह थाली देखने आती, लेकिन भगवान ने खिचड़ा नहीं खाया था। बहुत देर होने के बाद भी, जब भगवान जी ने भोग ग्रहण नही किया, तो उसे चिंता हुई कि, क्या पता भगवान जी को खिचड़े में स्वाद ना आ रहा हो, इसलिए ग्रहण नही कर रहे। इसमें घी की या गुड़ की कमी रह गई क्या। फिर, जाकर उसने और गुड़ व घी मिलाया और वहीं बैठ गई। लेकिन भगवान ने फिर भी भोग ग्रहण नही किया। तब मायूस होकर उसने कहा, हे प्रभु! आप भोग ग्रहण कर लीजिए। मां–बापू पुष्कर नहाने गए हैं। आपको भोग लगाने अभी कुछ दिन वो लोग नही आएंगे। आपको भोग लगाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई है। इसलिए आपके भोग लगाने के बाद ही मैं खाना खाऊंगी। परंतु, भगवान जी ने फिर भी भोग ग्रहण करना शुरू नही किया। फिर करमा उनसे शिकायत करते हुए बोली, मां–पिता जी, जब भोग लगाते हैं तब तो आप भोग ग्रहण कर लेते हैं। फिर, आज क्यों भूखे बैठे हैं। इतनी देर हो गयी है! खुद भी भूखे बैठे हैं और मुझे भी भूखा रखा है। यह सब बोल कर वह, भगवान के भोग ग्रहण करने की प्रतीक्षा करने लगी। परंतु यह क्या? अब तो सुबह से दोपहर समाप्त हो शाम हो चली थी।

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