भक्तों की महिमा अपरंपार है। उनकी लीला वही समझ सकता है जिसने कभी उस पतितपावन प्रभु की झाँकी देखी हो। भगवद्भक्तों के माध्यम से ही मनुष्य को भगवान् की एक झलक प्राप्त होती है। भगत दानसाय का जन्म अड़ंगपुर ग्राम में हुआ। दुर्भाग्यवश उनके माता-पिता का देहांत उनकी अल्पायु में ही हो गया। इसके बाद उनकी बुआजी ने बड़े स्नेह और सावधानी से उनका पालन-पोषण किया, किंतु यह सहारा भी अधिक दिनों तक न रहा। जब बुआजी का निधन हुआ, तब दानसाय मात्र सत्रह वर्ष के थे। जीवन की इस कठोरता ने उनके हृदय में एक सच्चे संरक्षक और नित्य आधार की खोज की भावना जगा दी। कुछ समय पश्चात् उन्होंने एक ज़मींदार के यहाँ नौकरी कर ली, जहाँ उन्हें गौ-चराने का कार्य सौंपा गया। वे अत्यंत ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते थे। जहाँ अन्य ग्वाले व्यर्थ की बातों में समय नष्ट करते, वहीं दानसाय भक्ति-भाव से भजन गाते रहते। एक दिन दुर्भाग्यवश उनकी एक गाय पास के खेत में चली गई। खेत के स्वामी ने क्रोधित होकर दानसाय की कमर पर सोटा मारा और कटु शब्दों में उन्हें अपमानित किया। इस घटना से दानसाय को अत्यंत ग्लानि हुई। अपनी भूल के प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने निश्चय किया कि अगले दिन वे नदी में एक पैर पर खड़े रहेंगे और रात भी वहीं व्यतीत करेंगे।
कथा प्रसंग 1
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