संत मलूकदास जी का हृदय प्रभु की भक्ति से सदा सराबोर रहता था। एक बार उनके मन में जगन्नाथ पुरी जाकर भगवान नीलमाधव (जगन्नाथ जी) के दर्शन करने की तीव्र इच्छा जागी। उस समय यातायात के साधन नहीं थे, भक्त पैदल ही लंबी यात्राएं तय करते थे। मलूकदास जी भी अपनी लाठी लेकर 'जय जगन्नाथ' जपते हुए पैदल ही चल पड़े। कई दिनों तक निरंतर चलने के कारण मलूकदास जी का शरीर थककर चूर हो गया। उनके पैरों में गहरे छाले पड़ गए थे और भूख-प्यास से गला सूख रहा था। चलते-चलते एक समय ऐसा आया जब उनके पैर आगे बढ़ने से इनकार करने लगे। वे एक घने वृक्ष की छाया में बैठ गए। वहां उनके मन में एक विचित्र भाव जागा। उन्होंने सोचा— "प्रभु तो घट-घट वासी हैं। यदि मेरी भक्ति सच्ची है और मैं वास्तव में उनका दास हूँ, तो मुझे उनके पास जाने की क्या आवश्यकता? क्या वे मेरे कष्ट को नहीं देख रहे? यदि वे सच में जगन्नाथ (जगत के स्वामी) हैं, तो उन्हें स्वयं अपने भक्त की सुध लेनी चाहिए।
कथा प्रसंग 1
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