कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 38 • कथा 9L01QEAlNRRjm1hoKj3s
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यह ब्रज की एक अत्यंत सरस और विनोदपूर्ण लीला है, जो दिखाती है कि भक्त के प्रेम में ठाकुर जी इतने सुध-बुध खो देते हैं कि उन्हें स्वाद का भी होश नहीं रहता। एक बार राधारानी की प्रिय सखी ललिता जी ठाकुर जी के लिए भोजन तैयार कर रही थीं। ब्रज की रसोई में तरह-तरह के व्यंजन बन रहे थे। कान्हा पास ही बैठे सखाओं के साथ हँसी-मजाक कर रहे थे और बार-बार पूछ रहे थे, "अरी ललिता! अभी कितनी देर है? बड़ी भूख लगी है। " रसोई में ताजी, लंबी और चटक हरी मिर्चें रखी हुई थीं।
