मूसलाधार वर्षा से सड़कें जलमग्न थीं। कीचड़ भरे रास्ते पर एक वृद्ध साधु, निर्लिप्त भाव से, मस्ती में गुनगुनाता हुआ चला जा रहा था। संसार की भाग-दौड़ से परे, उसका मन केवल प्रभु-स्मरण में रमा था। रास्ते में उसे एक मिठाई की दुकान दिखाई। भट्ठी पर एक कढ़ाही में दूध उफन रहा था और दूसरी में गरमागरम जलेबियाँ तल रही थीं। साधु कुछ क्षण ठिठक गया। उसकी सरल दृष्टि उस भट्ठी की लौ और उबलते दूध को निहारने लगी। दुकानदार बड़ा ही नेकदिल था। उसने बिना कुछ कहे एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियाँ साधु को प्रेमपूर्वक दे दीं। साधु ने प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया, दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर हलवाई के लिए प्रार्थना की और प्रसन्नचित्त आगे बढ़ गया। पेट भर जाने के बाद वह और भी निश्चिंत होकर चलने लगा। कीचड़ भरे पानी में उसके कदम पड़ते तो छींटे उड़ते। उसे इस बात का आभास न था कि उसके पीछे एक नवविवाहित दंपत्ति भी उसी रास्ते से, वर्षा से बचते हुए, चला आ रहा है।
कथा प्रसंग 1
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