कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 26 • कथा dzHUKbLJ6qk5WM1NpV0T
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एक धार्मिक स्थान पर एक सेठ जी भंडारा करते थे एक बार एक संत श्री वहाँ प्रसाद ग्रहण करने आये तो उन्होने देखा की सेठजी के मन मे अहंकार का उदय हो रहा है तो उन्होने कहा सेठजी बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही कर सकते, उसकी कृपा न हो तो खिलाना तो बहुत दूर की बात सामने परोसी हुई थाली अरे थाली क्या हाथ मे लिया ग्रास भी हाथ मे रह जाता है। सेठजी आप यही सोचना की दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम अरे ये तो उसकी महानता है जो कर तो वो रहा है और नाम हमें दे रहा है! सेठजी जो काम ईश्वर को करना है वो तो वो करेंगे आप तो ये समझना की उन्होने इस धर्म-कर्म के लिये मुझे चुना है यही मेरा परम सौभाग्य है!
