जब खाली हो गया था जगन्नाथ धाम का रत्न भंडार, क्यों नाराज हो गईं थीं देवी लक्ष्मी? कथा है कि, एक बार देवी लक्ष्मी शिव-पार्वती के समान ही धरती पर अपना निवास बनाने की इच्छा जताती हैं. इसके साथ ही उन्होंने भगवान विष्णु को खुद भोजन बनाकर भोग लगाने की इच्छा भी प्रकट की. तब भगवान विष्णु ने समय आने पर उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दिया. द्वापर युग के अंत में वह समय भी आ गया, जब श्रीकृष्ण ने देह त्यागी तो उसी के साथ पुरी के जगन्नाथ धाम के स्थापित होने की पटकथा लिखी जाने लगी थी. एक और कथा में कहा जाता है कि एक बार जब ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण तीनों लोकों का वैभव (लक्ष्मी) सागर में समा गया तो इसी सागर से लक्ष्मी फिर से प्रकट हुईं और यहीं उनका भगवान विष्णु से दोबारा मिलन हुआ. क्योंकि लक्ष्मी ने वरण पुरुषों में सबसे उत्तम भगवान विष्णु का वरण किया था, इसलिए यह क्षेत्र पुरुषोत्तम कहलाया और श्री (यानी लक्ष्मी) के यहां प्रकट होने के कारण इसे श्रीक्षेत्र कहा जाता है. देवी लक्ष्मी यहां अपने संपूर्ण वैभव के साथ विराजमान हैं. इसके अलावा वह श्री मंदिर की स्वामिनी (मालकिन) भी हैं, जिसका एक स्वरूप यहां स्थित रत्न भंडार के रूप में सामने आता है. जगन्नाथ धाम में रत्न भंडार से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है. यह कथा वैसे तो यह स्थापित करती है कि भगवान के लिए सब बराबर हैं, जन्म और जाति से कोई बड़ा-छोटा नहीं है, लेकिन इस कथा में रत्न भंडार का जिक्र एक खास किरदार की तरह का होता है. यह कहानी पुरी में रहने वाली और जाति से निम्न मानी जाने वाली श्रिया की है. पुरी में निम्न जाति की महिला श्रिया रहती थी. धन से गरीब पर संकल्प की धनी वह महिला देवी लक्ष्मी की उपासक थी और जगन्नाथजी के भरोसे ही जीवनयापन कर रही थी. एक बार उसकी इच्छा हुई कि वह देवी का कठिन अष्टलक्ष्मी व्रत करे, पर उसे व्रत की विधि नहीं पता थी. एक दिन वह रास्ते पर झाड़ू लगा रही थी कि इस दौरान उसे एक पुजारी मिला, जिससे वह व्रत की विधि पूछना चाहती थी, लेकिन उन्होंने श्रिया को तुरंत मना कर दिया.
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 31 • कथा 9GzEMkzDHONZQsVps215
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