राम नवमी विशेष श्रीराम कथा महिमा अध्याय -3 नारायण भट्ट जब अपनी नन्हीं पुत्री को कंधे पर बिठाकर घोर वन की ओर निकल पड़े, तब से अध्याय 3 की कथा और भी भावुक और चमत्कारिक हो जाती है। अध्याय 3 1. वन की कठिन यात्रा और अटूट भक्ति नारायण भट्ट अपनी पुत्री को लेकर घोर अरण्य (जंगल) में प्रवेश कर चुके थे। उनके पास न भोजन था, न जल, और न ही सिर छुपाने की जगह। भूख और प्यास से व्याकुल होकर उनकी पुत्री रोने लगी। वह बार-बार पूछती— "पिताजी, घर कब आएगा? मुझे भूख लगी है। " नारायण भट्ट की आँखों में आँसू थे, पर हृदय में केवल राम नाम था। उन्होंने अपनी बेटी को सांत्वना दी— "बेटी, श्रीराम ही हमारे रक्षक हैं, वे ही हमें भोजन देंगे। " वे जंगल में चलते हुए निरंतर "रामा, रामा" का जाप करते रहे और जहाँ भी रुकते, धूल पर ही श्रीराम का नाम लिखकर साष्टांग प्रणाम करते। 2. श्रीराम और लक्ष्मण का 'व्याध' (शिकारी) रूप में आगमन
कथा प्रसंग 1
पौराणिक कथाएँ 31 • कथा 9QVTcXHo9VYoUgVxOXNY
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