यह प्रसंग भक्ति मार्ग के अनन्य साधक श्री घनश्याम ठाकुर जी के जीवन की एक अलौकिक झांकी है। इसमें भक्त, भगवान और संतों के बीच के उस सूक्ष्म संबंध को दर्शाया गया है जहाँ तर्क समाप्त होता है और श्रद्धा का साम्राज्य शुरू होता है। भक्त और भगवान का मिलन: घनश्याम ठाकुर और सूक्ष्म देह का रहस्य 1. गिरिराज तलहटी में दिव्य मिलन एक समय की बात है, श्री घनश्याम ठाकुर जी श्री गिरिराज जी की परिक्रमा कर रहे थे। गोवर्धन की तलहटी में पहुँचते ही उन्हें एक जानी-पहचानी आवाज़ ने पुकारा। स्वर की दिशा में मुड़े तो देखा कि पंडित श्री गयाप्रसाद जी शांत भाव से विराजमान हैं। ठाकुर जी को देखते ही उनके मुख पर मंद मुस्कान थिरक उठी। ठाकुर जी ने ठिठोली करते हुए पूछा— "बाबा! अब तो ना मारोगे? " (यह उस समय की याद थी जब उड़िया बाबा जी के आश्रम में रासलीला के दौरान, दावानल कुंड में स्नान करते समय पंडित बाबा ने बालक ठाकुर को प्रेम भरी ताड़ना दी थी)। पंडित जी भावुक हो गए और उन्हें हृदय से लगा लिया। बोले— "ठाकुर! अब खातिरदारी बहुत हुई, अब कुछ पद सुनाओ।
कथा प्रसंग 1
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